Sunday, 14 July 2019

Poem

मुझे खुद से शिकायते हजार हैं
ना जाने और कितने मेरी तरह गुनाहगार है
खुद पर किया मुकदमा लड़ा जाता नहीं
अपनी गवाही को यह दिल पेश कर पाता नहीं
कई किस्से दफन हैं किसी कोने में मन के
इन्हें सुनने वाला कोई मगर नजर हमें आता नहीं
हजारों दलीलें देने पर भी अर्जी खारिज हो जाती है
ना जाने जिंदगी हमें किस जुर्म की सजा सुनाती है
सजा-ए-मौत दे दे या रिहा कर दे अब
यूं हर तारीखों पर अपनी सच्चाई की वकालत
                                   अब हमसे की जाती नहीं

                    Jagriti Srivastava

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