मुझे खुद से शिकायते हजार हैं
ना जाने और कितने मेरी तरह गुनाहगार है
खुद पर किया मुकदमा लड़ा जाता नहीं
अपनी गवाही को यह दिल पेश कर पाता नहीं
कई किस्से दफन हैं किसी कोने में मन के
इन्हें सुनने वाला कोई मगर नजर हमें आता नहीं
हजारों दलीलें देने पर भी अर्जी खारिज हो जाती है
ना जाने जिंदगी हमें किस जुर्म की सजा सुनाती है
सजा-ए-मौत दे दे या रिहा कर दे अब
यूं हर तारीखों पर अपनी सच्चाई की वकालत
अब हमसे की जाती नहीं
Jagriti Srivastava