Sunday, 5 May 2019

क्यों ना

जमाने में गम और भी कई है इश्क़ के अलावा भी
फिर क्यों प्यार करके यूं दिल को अपने दुखाया जाए
मौसम कई आते है मुस्कुराने के
तो क्यों ना बदलते मौसमो के साथ मुस्कुराया जाए
तरीके तो और भी कई है दर्द मिटाने के
फिर क्यों हार कर यूं मैखाने की तरफ़ जाया जाए
ऐसा करे कि चंद पानी कि बूंदो से ही
              अंदर लगी इस आग को मिटाया जाए
बुराइयां तो खुद में भी लाखो भरी है
  फिर क्यों किसी और को गुनाहगार बनाया जाए
  खुदा को छोड़कर उपर ही
              क्यों ना इंसान बनकर ही दिखाया जाए    
           तोड़ना तो तूफान का काम होता है
      क्यों ना किसी के जुड़ने का जरिया बन जाया जाए
   तो फिर छितिज बनकर ही
क्यों ना जमीन और आसमान को मिलाया जाए     
कामयाबी पर तो खुश सभी होते हैं
क्यों ना अब बर्बादियो का जश्न मनाया जाय
कोई सो सके चैन कि नींद
इसके लिए अपनी कुछ राते क्यों ना जाग कर ही बिताया जाए ।
           
                   Jagriti Srivastava
                                                    
                              
                              

No comments:

Post a Comment

अकेलापन

अकेलापन डरावना नहीं होता, अगर हम उसे समझें। एकांत में मन की आवाज़ सबसे स्पष्ट सुनाई देती है। ये समय होता है खुद से मिलने का, खुद...