काश मैं भी बेजान होती
कि काश मुझ में भी ना कोई जान होती
ना होता मुझे किसी दर्द का एहसास
कि काश मैं भी बेजुबान होती
कि अब थक चुकी हूं मैं उल्फत से, उलझन से इस जिंदगी की
सोचती हूं काश कि मैं भी ना एक इंसान होती
ना सीने में दिल धड़कता मेरा
ना ही सांसे चल रही होती
कि काश मैं भी लावारिस सा पड़ा कोई एक समान होती
जिस कदर गमों ने घेरा है
हर वक्त दुखों का डेरा है
अच्छा होता कि ना मेरी कोई पहचान होती,
काश कि मैं भी बेजान होती
जिस तरह सपनों में होती है
कि काश जिंदगी वैसी ही वरदान होती
हम चाहते जैसा, होता वैसा ही
कि काश जिंदगी ना इतनी बेईमान होती
शौक से रहते हम भी नवाबों की तरह
काश जिंदगी इतनी आसान होती है
या काश कि मैं ही बेजान होती
Jagriti Srivastava
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